कुछ हंसी मज़ाक शायरी - 3
सीने में जलन है और दिल में ज़बरदस्त तूफ़ान का है कहर
अढ़ाई पाव पकोड़ों जो खा डाले थे या उल्फत का है असर
फेसबुक पर हम नैन लड़ा बैठे
उसे बाजार में मिलने बुला बैठे
अपने ही पडोसी चंदूलाल से
खुद को उल्लू बनवा बैठे
हलवा बनाये बैठे थे काजुओं बादाम वाला
सजनी तूने सारा क्यों और कब खा डाला
जेल कचहरी न थाने में डरते हैं
उन से नज़र मिलाने में डरते हैं
छोटी से उम्र में सर गंजा क्यों है
राज की बात बताने मैं डरते हैं।
किसे मालूम था
महफ़िल में वो भी आ जायँगे
इस ख़ुशी में हम ज्यादा खा जायेंगे
सीढियाँ भी नहीं उतर पायंगे
और वहीँ ढेर हो जायेँगे
दंगल-ए-इश्क़ तुम्हारी गली में एक जूता वहीं छोड़ आये हम
तुमही ढूंढ लेना इसे हमारे लिए तुमही संभाल रखना सनम
गर मालूम होता उल्फतें खा जायेंगी इतने पैसे
इससे तो हम खरीद लाये होते तीन चार भैसें
दो साल पहले वो हमें दे गयी थी लाखों गम भयानक
हम आज उसके दो बच्चों के मामा बन गए अचानक
उसकी डोली उठने का सदमा कम न था
इधर बैंक वाले हमारा बुलेट उठा गए
सजनी छत्त पर गीत गाती है जबसे
हमारी भैंसे भोत परेशान हैं तबसे
सजनी तुमने मेरी कैसी तस्वीर बना डाली
मुँह टेड़ा और टांगों पर पोलियो दिखा डाली
प्यार हुआ है जबसे पूरे गुलशन में मस्ती छाने लगी
हमारी भैंसें भी झूमने लगी और रागिनीं गाने लगीं
उल्फतों में डूबते डूबते हुए हम नामी तैराक बन गए
पता भी नहीं लगा कब इस इल्म के उस्ताद बन गए
चार हसीनों का करवा रहे हैं हम रिचार्ज
शायद कोई एक तो निकलेगा सच्चा प्यार
ऊपर से चाहे हम घोड़ों की तरह तंदुरुस्त नज़र आते हैं
दो पल बैठो साथ हम तुम्हे दिल के जख्म दिखलातें है
जब तुमने छुआ था एक बिजली का झटका सा लगा था
ऐसी कुछ खुराकें और मिल जायें ये खोपड़ी सेट हो जाय
किसे मालूम था वो गैरों के साथ बाजार में नज़र आयंगे
हम गश खाकर गिर जायंगे ओर लोग हमे जूते
सुंघायेंगे
तुम अगर घास खाने का वादा करो
मैं यूँ ही मस्त नग्मे लुटाता रहूँ।
अपने friend का भी रिचार्ज हमीं
से करवाते रहे
हमारे ही खाते से गैरों से इश्क़ लड़ाते रहे
हमारी मुहोब्बत बन गयी है अब
सांप और सीढ़ी वाली लूडो का खेल
कभी मंज़िल नज़दीक तो कभी
वो नज़रों से ही वापिस देतें हैं नीचे धकेल
मजनू ये पूछता था लैला के कारवां से
बतलाओ मोल लाये हो ये गधे तुम कहाँ से
गर थामा दामन तो कभी नहीं खिसकेंगे
हम सात जनम तक तुम्हे ही चिपकेंगे
दिल तोड़ कर भी मेरे फ़न का खूब फायदा उठाया था
अपनी शादी पर मलाई कोफ्ता मुझ ही से बनवाया था
हमारा बुलेट उसकी गली में ही रोज पंक्चर होता है
इसके पीछे उसका कोई ओर भी आशिक़ होता है
तुम गीतों की सुरबाला
मेरा भैंसों का व्यापार प्रिये।
तुम सुर से सुर मिलाना
अब कैसी तकरार प्रिये।
उधर असली घी का हलवा इधर सनम का जलवा
जलवे तो कल भी होंगे चलो आज खाते हैं हलवा
हमारा ये दिल नहीं रहा अब हमारा
इस प्रॉपर्टी पर अब कब्ज़ा हो गया तुम्हारा
तुम्हारी खातिर अब हम अकल से जीने लगे हैं
रोजाना लोकी ओर करेले का जूस पीने लगे हैं
सभी ऊँचाइयों के इरादे छोड़ दिए हमने
अपनी खाट के पाए तक तोड़ दिए हमने
आप जिंदगी में आये कि ख़ुशी दिल में न समाये
जैसे किसी कंगले को फिर नया लोन मिल जाये
किसे मालूम था एक दिन ये गुलशन-ए-मुहोब्बत ख़ाक होगा
किसे मालूम था हम जिस से भिड़े बैठे वो उसी का बाप होगा
यहाँ हम उनकी भैंसों को नहला रहें हैं
वहां वो गैरों के साथ पिज़्ज़े खा रहें हैं
उनकी बेवफ़ाइयों की लिस्ट बना रहें हैं
हर रोज़ पन्ने पर पन्ने भरतें जा रहें हैं
दो दो फोनों में दो दो सिम डलवा रखी हैं
सनम ने ये अच्छी नई स्कीम चला रखी है
हम तो उनकी जुल्फों में बस जायें
गर वो नारियल का तेल न लगायें
जबसे इस मुहोब्बत का शोला भड़कने लगा है
नथुने फड़कने लगे हैंऔर दिल धड़कने लगा है
जबसे उल्फत हुई है हमारी खोपड़ी को नही है आराम
हल्दीराम को निकलते हैं ओर पहुंच जाते हैं जलदीराम
जबसे इस मुहोब्बत का शोला भड़कने लगा है
नथुने फड़कने लगे हैंऔर दिल धड़कने लगा है
इश्क़ पर हमने पूरी अहमियत लगा रखी है
इस काम के लिए बाकायदा वर्दी सिलवा रखी है
तुम बिन हम अधूरे
जैसे बिन चनों के भटूरे।
ये लाल मिर्चों जैसे होंठ ये बीसों मिस कालें
हमे जीने नहीं देतीं ये तुम्हारी गोरी गालें
जब से हुआ है प्यार कुछ मस्ती सी छाने लगी है।
खुराक रह गयी है आधी कमज़ोरी भी आने लगी है।।
कम्बख्त इश्क़ में क्या क्या गुल खिलाये
हमने भैंस बेच डाली और बुलेट ले आये
न कोई दस्तक न कोई सरसराहट, ये कौन आ गया है
चार अंडो का आमलेट बना कर गये थे ये कौन खा गया है
वो लाख पर्दों में छुपते रहें हमसे
पर कब तक हम से दूर रह पायेंगे
उनके घर में जबभी कोई प्रोग्राम होगा
उनके घरवाले हलवा हमी से बनवायेंगे
एक तरफ आपका घर
एक तरफ मयकदा
बड़े बड़े देवदास लुढ़क गए
हम किस बाग़ की मूली हैं
उन्हें देखते ही खिल जाती हैं हमारी बांछे कान से कान तक
वो समझते हैं आजकल हम खींच रहें हैं गांजा सुबह से शाम तक
तुम जिंदगी में आये
जीने की चाहत जाग गई जभी से
अगर तुम न होते तो
हम मर मरा गये होते कभी के
किसे मालूम था वो हमारे ही एक दोस्त के हो जायेंगे
उसकी शादी में हम दूल्हा नहीं पर बाराती बन कर आयेंगे
इरादा-ए-सेहत खोपड़ी में घुसा रखा है
हमने लोकी का पूरा खेत उगा रखा है।
आपकी गलियां देखेंगे फिर कभी
आज तो कई जगह भंडारे लगे हैं
मुर्गों से भी पहले जागकर हम क्यों देते हैं बांगे
वो जागकर चौबारे पर आ जाये और दीदार हो जाये
जब जब हम उल्फत के गीत गाने लगें हैं
पडोसी भी उसी वक़्त ढोल बजाने लगे हैं
तुम साथ ज़ीने का इरादा तो करो तुम देखना तुम्हारे दिन फिर जायेंगे
हम रोज़ तुम्हारे लिए कभी लच्छेदार परांठे तो कभी मालपूड़े बनायेंगे
हम रोज़ तुम्हारे लिए कभी लच्छेदार परांठे तो कभी मालपूड़े बनायेंगे
सनम अब सरकारी इंस्पेक्टरों के से तेवर दिखाने लगी है
हम पर धौंस जमाने लगी है और खूब पैसा खाने लगी है
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